एमपीजी कॉलेज मसूरी में प्रबंधन गठन पर बड़ा विवाद
Major Controversy Over Formation of Management Body at MPG College Mussoorie
देहरादून/मसूरी:
हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय द्वारा 6 फरवरी को गूगल मीट के माध्यम से आयोजित बैठक में एमपीजी कॉलेज (म्युनिसिपल पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज) मसूरी की प्रबंधन समिति के गठन को लेकर भारी अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। बैठक में कॉलेज प्रशासन की अनुपस्थिति और पारदर्शिता की कमी ने पूरे मामले को संदिग्ध बना दिया है।
सूत्रों के अनुसार, न तो कॉलेज के प्राचार्य और न ही कोई अधिकृत प्रतिनिधि बैठक में शामिल हुआ। यहां तक कि ऑनलाइन या फोन के माध्यम से भी अपनी बात रखने का प्रयास नहीं किया गया।
क्या हैं मुख्य आरोप?
1. संचालन संस्था पर अस्पष्टता:
व्हिसल ब्लोअर्स का आरोप है कि यदि कॉलेज नगर पालिका परिषद मसूरी द्वारा संचालित नहीं है, तो इसका वास्तविक संचालन कौन कर रहा है? किसी सोसायटी या ट्रस्ट का दावा किया जाता है, तो उसका पंजीकरण विवरण सार्वजनिक क्यों नहीं है?
2. सुरक्षा निधि और अधिनियम का उल्लंघन:
यदि कॉलेज नगर पालिका द्वारा अनुरक्षित है, तो उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 (उत्तराखंड में लागू) की धारा 2(13) के तहत ‘शिक्षा समिति’ का गठन अनिवार्य है। इसके विपरीत ‘प्रबंधन समिति’ के गठन की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं।
3. बायलॉज की मूल प्रति गायब:
कॉलेज प्रशासन अपनी उपविधियों/संविधान की मूल प्रति प्रस्तुत करने में असफल रहा है। इससे नियमों में मनमाने बदलाव की आशंका जताई जा रही है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि बायलॉज को किस सक्षम प्राधिकारी से मंजूरी मिली है।
4. वेतन संकट गहराया:
अधिनियम की धारा 60E के कथित उल्लंघन के चलते कर्मचारियों को अक्टूबर 2025 से वेतन नहीं मिला है। प्रबंधन समिति की वैधता पर प्रश्नचिन्ह का सीधा असर स्टाफ पर पड़ रहा है।
5. कार्यकाल में विसंगति:
नगरपालिका की विभागीय समिति के प्रस्ताव के आधार पर तीन वर्ष के कार्यकाल की मांग की जा रही है, जबकि विभागीय समिति का कार्यकाल मात्र एक वर्ष होता है।
6. राज्य प्रतिनिधि की गैरमौजूदगी:
चूंकि कर्मचारियों का वेतन राज्य सरकार देती है, ऐसे में बैठक में राज्य प्रतिनिधि को आमंत्रित न किया जाना भी सवालों के घेरे में है।
विश्वविद्यालय से मांग
मामले से जुड़े पक्षों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से पूर्व में प्रस्तुत दस्तावेजों की प्रति उपलब्ध कराने और ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत’ के तहत अंतिम निर्णय से पहले पक्ष रखने का अवसर देने की मांग की है।
चेतावनी दी गई है कि यदि छात्र हित और कर्मचारियों के अधिकारों की अनदेखी हुई, तो उच्च अधिकारियों और न्यायालय का दरवा
जा खटखटाया जाएगा।
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