मसूरी के पास जौनपुर क्षेत्र में पारंपरिक मौंड मेले का भव्य आयोजन, हजारों ने देखा मछलियों का अनोखा शिकार
मसूरी। उत्तराखंड में कई ऐतिहासिक मेले आयोजित किए जाते हैं और जो अपने आप में पहाड़ी विरासत समेटे हुए हैं। इसी प्रकार यमुना की सहायक नदी अगलाड़ में ऐतिहासिक राजमौण मेला हर्षाेल्लास से मनाया गया। मेले में यमुना घाटी, अगलाड़ घाटी तथा भद्रीघाटियों के दर्जनों गांवों के साथ ही समीपवर्ती जौनसार के अलावा मसूरी तथा विकासनगर के ग्रामीण शामिल हुए। रविवार को सैकडों की संख्या में ग्रामीण एक साथ नदी में उतरते हैं और कई टंन मछली पकड़ी। मेले के दौरान, ढोल-दमाऊ की थाप पर ग्रामीण ने पराम्परिक नृत्य भी किया।
अगलाड़ नदी में मनाया जाने वाला यह मौण मेला लगभग 159 साल पुराना है। इतिहासकारों का मानना है कि यह मौण मेला सन 1866 में राजशाही काल में शुरू हुआ था। राजशाही काल में टिहरी नरेश मौण मेले में मौजूद रहते थे। प्रत्येक साल जून के अंतिम सप्ताह में अगलाड़ नदी में मछली पकड़ने का सामूहिक त्योहार मनाया जाता रहा है।
लालूर पट्टी खैराड़, नैनगांव, मरोड़, मताली, मुनोग, कैथ तथा भूटगांव के ग्रामीण टिमरू पाउडर लेकर ढोल-दमाऊ के साथ अगलाड़ नदी के मौण कोट नामक स्थान पर पहुंचे और जल देवता की विधिवत पूजा-अर्चना के साथ टिमरू पाउडर से सभी पांतीदारों का टीका करने के बाद टिमरू पाउडर नदी में डाला गया। इसके बाद ग्रामीण मछलियां पकड़ने नदी में उतरे। मौणकोट से लेकर अगलाड़ व यमुना नदी के संगम स्थल तक लगभग चार किमी क्षेत्र में लोगों ने मछलियां पकड़ी।
बता दे कि मौण मेले का मुख्य उद्देश्य नदी और पर्यावरण का संरक्षण करना है. टिमरू पाउडर का उपयोग करके, मछलियां बिना किसी नुकसान के पकड़ी जाती हैं और फिर पानी में वापस छोड़ दी जाती हैं।
स्थानीय निवासियों ने बताया कि मसूरी में मौण मेला एक पारंपरिक मछली पकड़ने का त्यौहार है जो जौनपुर क्षेत्र में, खासकर अगलाड़ नदी में, जून के अंतिम सप्ताह में मनाया जाता है. यह मेला टिहरी रियासत काल से मनाया जा रहा है और इसे राजमौण या भींड का मौण भी कहा जाता है. इस मेले में, ग्रामीण टिमरू पाउडर का उपयोग करके मछलियां पकड़ते हैं, जो नदी में मछलियों को बेहोश कर देता है।
प्राचीन परंपरा के अनुसार, नदी में तिमरू के पत्तों का पाउडर डालकर मछलियों को बेहोश किया जाता है, जिससे उन्हें आसानी से पकड़ा जा सके। यह तरीका न केवल अनोखा है, बल्कि स्थानीय जनजातीय संस्कृति और प्राकृतिक ज्ञान का प्रतीक भी माना जाता है। मेले के समय पर नदी में तेज बहाव और भारी भीड़ को देखते हुए राष्ट्रीय आपदा मोचन बल एसडीआरएफ की टीम ने मौके पर मोर्चा संभाला। नदी किनारे बचाव दल और प्राथमिक चिकित्सा टीम भी तैनात रही, जिससे मेला शांतिपूर्वक और सुरक्षित ढंग से सम्पन्न हुआ।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह परंपरा संतुलित रूप से निभाई जाए, तो यह जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी लाभकारी हो सकती है। स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि यह मेला सदियों पुरानी आस्था और सामुदायिक एकता का प्रतीक है। मौंड मेला केवल मछली पकड़ने का पर्व नहीं, बल्कि यह पर्व संस्कृति, आस्था और आनंद का जीवंत संगम है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक ने इस मेले का खूब आनंद लिया और परंपराओं से जुड़ाव महसूस किया।
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