उत्तराखंड में जल संरक्षण की बड़ी पहल, 14 हजार से ज्यादा प्राकृतिक जलस्रोतों का हुआ सूचीकरण

Oct 16, 2026 - 09:30
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उत्तराखंड में जल संरक्षण की बड़ी पहल, 14 हजार से ज्यादा प्राकृतिक जलस्रोतों का हुआ सूचीकरण
उत्तराखंड में जल संरक्षण की बड़ी पहल, 14 हजार से ज्यादा प्राकृतिक जलस्रोतों का हुआ सूचीकरण

अल्मोड़ा: हिमालयी क्षेत्र में जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए उत्तराखंड में अहम पहल की गई है। राज्य में 14 हजार से अधिक प्राकृतिक जलस्रोतों की मैपिंग और सूचीकरण पूरा होने की जानकारी सामने आई है। इस पहल का उद्देश्य पारंपरिक जलस्रोतों की पहचान कर उन्हें संरक्षित करना और आने वाले समय में जल संकट की चुनौती से निपटने के प्रयासों को मजबूत बनाना है।

इस संबंध में दिल्ली में गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान की 27वीं बैठक आयोजित की गई। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में हुई बैठक में हिमालय के पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता और पर्वतीय क्षेत्रों के सतत विकास से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई। बैठक में वैज्ञानिक अनुसंधान के माध्यम से हिमालयी पारिस्थितिकी को सुरक्षित रखने और स्थानीय लोगों की आजीविका बेहतर बनाने पर विशेष जोर दिया गया।

जल अभयारण्य पहल से संवारे जाएंगे प्राकृतिक जलस्रोत

बैठक में संस्थान के निदेशक डॉ. आईडी भट्ट ने पिछले एक साल के दौरान किए गए कार्यों और अनुसंधान की जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि संस्थान जल सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, हिमनदों के अध्ययन, जैव विविधता संरक्षण, पर्यटन विकास, आजीविका संवर्धन और आपदा जोखिम कम करने जैसे क्षेत्रों में काम कर रहा है।

संस्थान की ओर से जल अभयारण्य पहल के तहत प्राकृतिक जलस्रोतों को दोबारा जीवंत करने के मॉडल विकसित किए जा रहे हैं। जलस्रोतों की पहचान और उनका व्यवस्थित रिकॉर्ड तैयार होने से संरक्षण की योजनाओं को बेहतर तरीके से लागू करने में मदद मिल सकती है।

पिरूल से तैयार होंगे मूल्यवर्धित उत्पाद, तकनीक का हस्तांतरण

हिमालयी क्षेत्रों में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग बढ़ाने के साथ स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर तैयार करने पर भी काम किया जा रहा है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम में स्थानीय आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण के लिए केंद्र स्थापित किए गए हैं।

बैठक में यह भी जानकारी दी गई कि चीड़ की पत्तियों यानी पिरूल से मूल्यवर्धित उत्पाद बनाने की तकनीक समाज को हस्तांतरित की गई है। इससे स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों के उपयोग और उनसे जुड़े रोजगार को बढ़ावा देने की संभावनाएं बन सकती हैं। वहीं, उपचारित अपशिष्ट जल आधारित हाइड्रोपोनिक तकनीक के लिए संस्थान को पेटेंट मिला है। इसके अलावा तीन अन्य पेटेंट के लिए प्रक्रिया जारी है।

हिमालयी गांवों की अर्थव्यवस्था मजबूत करने पर फोकस

बैठक में सदस्यों ने कहा कि हिमालयी गांवों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए अनुसंधान तथा विकास से जुड़े कार्यों को और मजबूत बनाने की जरूरत है। केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने स्थानीय उत्पादों की जीआई टैगिंग, जैव विविधता पंजीकरण, लाभ-साझाकरण और संस्थागत सहयोग को प्राथमिकता देने पर बल दिया। बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण के लिए केवल वैज्ञानिक अध्ययन ही नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों की भागीदारी और प्रभावी नीतियां भी जरूरी हैं।

प्राकृतिक जलस्रोतों का संरक्षण, स्थानीय संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल और पर्वतीय समुदायों की आजीविका को बढ़ावा देने के प्रयास आने वाले समय में हिमालयी क्षेत्र के सतत विकास के लिए अहम साबित हो सकते हैं।

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