मानसून से पहले बदले मौसम के तेवर, जानिए इस बार बारिश को लेकर क्या है भविष्यवाणी

Jun 15, 2026 - 16:16
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मानसून से पहले बदले मौसम के तेवर, जानिए इस बार बारिश को लेकर क्या है भविष्यवाणी

देहरादून: उत्तराखंड में मानसून की आधिकारिक दस्तक अभी बाकी है, लेकिन उससे पहले ही मौसम का बदला हुआ मिजाज लोगों की चिंता बढ़ा रहा है. मई और जून महीने में जिस तरह लगातार बारिश, तेज हवाएं और आकाशीय बिजली की घटनाएं देखने को मिली हैं, उसने लोगों के मन में एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर इस बार मानसून कैसा रहेगा? क्या आने वाले दिनों में प्रदेश को भारी बारिश और आपदाओं का सामना करना पड़ेगा या फिर हालात सामान्य रहेंगे?दरअसल देश के कई हिस्सों में मानसून प्रवेश कर चुका है और अब यह दक्षिण भारत से आगे बढ़ते हुए उत्तर भारत की ओर बढ़ रहा है. मौसम विभाग की मानें तो आगामी दिनों में मानसून उत्तराखंड की ओर भी तेजी से बढ़ेगा और करीब 25 जून तक इसके प्रदेश पहुंचने की संभावना है. लेकिन मानसून के पहुंचने से पहले ही प्री-मानसून गतिविधियां लोगों को डरा रही हैं.

इस साल मई का महीना सामान्य वर्षों की तुलना में काफी अलग रहा. प्रदेश के अधिकांश जिलों में औसत से अधिक बारिश रिकॉर्ड की गई. राजधानी देहरादून में तो एक दिन की बारिश ने 86 साल पुराना रिकॉर्ड तक तोड़ दिया. आमतौर पर मई महीने में इतनी अधिक बारिश देखने को नहीं मिलती, लेकिन इस बार लगातार पश्चिमी विक्षोभ और सक्रिय मौसम प्रणाली के कारण प्रदेश में कई दौर की बारिश हुई.जून महीने में भी यही सिलसिला जारी है. कई इलाकों में लगातार बारिश हो रही है. इसके साथ तेज हवाओं और आकाशीय बिजली की घटनाओं में भी बढ़ोतरी देखने को मिली है.

कई जगह पेड़ गिरने, बिजली लाइनों को नुकसान पहुंचने और जनजीवन प्रभावित होने की घटनाएं सामने आई हैं. यही वजह है कि लोगों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि अगर प्री-मानसून में ही मौसम इतना आक्रामक है तो मानसून के दौरान हालात कितने चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं.हालांकि लोगों की इन आशंकाओं के बीच मौसम विभाग की भविष्यवाणी कुछ अलग तस्वीर पेश कर रही है. मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस बार मानसून सीजन के दौरान उत्तराखंड में सामान्य से करीब 5 से 8 प्रतिशत कम बारिश हो सकती है. यानी पूरे मानसून सीजन में बारिश की कुल मात्रा औसत से थोड़ी कम रहने की संभावना जताई गई है.

मानसून सीजन को देखते हुए सभी जिलों में आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित कर दी हैं. संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान की गई है और वहां विशेष निगरानी की व्यवस्था बनाई गई है. साथ ही फील्ड स्तर पर अधिकारियों और कर्मचारियों की तैनाती के निर्देश भी जारी किए गए हैं ताकि किसी भी आपदा की स्थिति में त्वरित कार्रवाई की जा सके.
-विनोद कुमार सुमन, सचिव, उत्तराखंड आपदा प्रबंधन विभाग-

पहली नजर में यह अनुमान राहत देने वाला लग सकता है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल कुल बारिश के आंकड़ों के आधार पर मानसून की गंभीरता का आकलन नहीं किया जा सकता. पिछले कुछ वर्षों का अनुभव बताता है कि कुल वर्षा कम होने के बावजूद आपदाओं का खतरा कम नहीं हुआ है. बल्कि कई मामलों में कम अवधि में अत्यधिक बारिश ने अधिक नुकसान पहुंचाया है.इसी खतरे को देखते हुए राज्य सरकार और आपदा प्रबंधन विभाग अभी से पूरी तैयारी में जुट गए हैं. विभाग का कहना है कि भले ही मौसम विभाग सामान्य से कम बारिश का अनुमान जता रहा हो, लेकिन किसी भी स्थिति से निपटने के लिए व्यापक तैयारियां की गई हैं.

प्रदेश के पर्वतीय जिलों में भूस्खलन, सड़क अवरोध, बादल फटने और नदी-नालों के उफान जैसी घटनाएं हर साल चुनौती बनकर सामने आती हैं. ऐसे में प्रशासन का फोकस इस बार भी संवेदनशील इलाकों पर बना हुआ है. राहत और बचाव से जुड़े संसाधनों को भी पहले से तैयार रखा जा रहा है ताकि आपातकालीन स्थिति में तत्काल राहत पहुंचाई जा सके. उधर हिमालयी क्षेत्र में मौसम और पर्यावरणीय बदलावों का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञ भी लगातार बदलते मौसम पैटर्न को लेकर चिंता जता रहे हैं.

मानसून के दौरान कुल बारिश कम होने का अनुमान लोगों को भ्रमित नहीं करना चाहिए. आपदा का खतरा केवल बारिश की मात्रा से नहीं बल्कि उसके वितरण और तीव्रता से तय होता है. पिछले कुछ वर्षों में मौसम के व्यवहार में बड़ा बदलाव देखने को मिला है. पहले जहां बारिश लंबे समय तक धीरे-धीरे होती थी, वहीं अब कम समय में अत्यधिक बारिश की घटनाएं बढ़ी हैं. यही कारण है कि बादल फटने, फ्लैश फ्लड और लैंडस्लाइड जैसी घटनाएं अधिक देखने को मिल रही हैं. -प्रोफेसर एसपी सती, हिमालयी पर्यावरण के जानकार-

विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु परिवर्तन का असर हिमालयी राज्यों में सबसे अधिक महसूस किया जा रहा है. तापमान में वृद्धि, ग्लेशियरों में बदलाव और मौसम प्रणालियों के असामान्य व्यवहार के कारण वर्षा का पारंपरिक पैटर्न तेजी से बदल रहा है. यही वजह है कि कभी लंबे समय तक सूखा जैसी स्थिति बन जाती है तो कभी कुछ घंटों की बारिश ही भारी तबाही का कारण बन जाती है. उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पर्वतीय राज्य के लिए यह स्थिति विशेष चिंता का विषय है. यहां बड़ी संख्या में आबादी नदी घाटियों और भूस्खलन संभावित क्षेत्रों में निवास करती है.

इसके अलावा चारधाम यात्रा, पर्यटन गतिविधियां और पहाड़ी सड़कों पर निर्भर परिवहन व्यवस्था भी मौसम की मार से सीधे प्रभावित होती है. फिलहाल उत्तराखंड मानसून के स्वागत की तैयारी कर रहा है. मौसम विभाग 25 जून के आसपास मानसून के प्रदेश पहुंचने की संभावना जता रहा है. दूसरी ओर प्रशासन और आपदा प्रबंधन विभाग किसी भी चुनौती से निपटने के लिए अपनी तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुटे हैं.

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