अभिजीत दीपके के आंदोलन पर अचानक लगा ब्रेक, क्या कमजोर पड़ रही थी रणनीति या कोई बड़ा खेल?
नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रमुख अभिजीत दीपके ने अचानक आंदोलन स्थगित करने का फैसला लेकर सियासी चर्चाओं को तेज कर दिया है। जिस आंदोलन को लेकर वह लगातार मुखर थे, उसे फिलहाल रोकने के पीछे आखिर क्या वजह है? दीपके ने समर्थकों को त्योहार परिवार के साथ मनाने की सलाह दी है, लेकिन उनके इस कदम को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। चर्चा है कि इसके पीछे विवादों का दबाव, सहयोगियों को राहत दिलाने की कोशिश या फिर उम्मीद के मुताबिक समर्थन न मिलना जैसी वजहें हो सकती हैं।
क्या आंदोलन की छवि को लेकर बढ़ने लगी थी चिंता?
दीपके के फैसले को लेकर पहली चर्चा आंदोलन से जुड़े बयानों और विवादों की है। रिपोर्ट के मुताबिक, नेहा बोरा और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण की ओर से रेजीम चेंज और बांग्लादेश के जेन-जी आंदोलन का संदर्भ दिए जाने के बाद आंदोलन की दिशा को लेकर सवाल उठने लगे थे। ऐसी परिस्थितियों में संगठन के सामने अपने मूल मुद्दे पर ध्यान बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो सकती थी। माना जा रहा है कि आंदोलन को लेकर किसी तरह का नकारात्मक संदेश फैलने से पहले नेतृत्व ने अस्थायी विराम को बेहतर विकल्प समझा हो। हालांकि, यह केवल एक संभावना है और दीपके की ओर से इसकी पुष्टि नहीं की गई है।
जेल में बंद साथियों के लिए बदली रणनीति?
आंदोलन स्थगित करने के फैसले को सौरभ दास और आशुतोष रांका की कानूनी स्थिति से जोड़कर भी देखा जा रहा है। दोनों के जेल में होने के बीच दीपके का यह कदम चर्चा का विषय बन गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने दोनों की रिहाई को लेकर कानून के पालन से जुड़ी आशंकाएं जताई थीं। ऐसे में यह अटकल लगाई जा रही है कि आंदोलन को फिलहाल रोकने का संदेश देकर दीपके अपने सहयोगियों के मामले में राहत की संभावनाएं बेहतर करना चाहते हों। लेकिन यह साफ नहीं है कि आंदोलन रोकने और दोनों सहयोगियों की रिहाई के बीच कोई सीधा संबंध है। इसलिए इस पहलू को संभावित रणनीति के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
क्या सड़कों पर घटने लगा था आंदोलन का असर?
दीपके के फैसले के पीछे तीसरी वजह आंदोलन की भागीदारी को माना जा रहा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान अपेक्षित संख्या में लोग नहीं जुटे। इसके बाद 16 अक्टूबर को कनॉट प्लेस में आयोजित 'लहरा दो तिरंगा' कार्यक्रम को लेकर भी समर्थकों की मौजूदगी पर सवाल उठे। इन कार्यक्रमों की तुलना 20 जुलाई के 'संसद चलो' मार्च से की जा रही है, जिसमें युवाओं की बड़ी भागीदारी की बात कही गई थी। ऐसे में हालिया प्रदर्शनों में कम उत्साह की चर्चा ने संगठन के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी होगी। अगर आंदोलन को अपेक्षित जनसमर्थन नहीं मिल रहा था, तो कुछ समय का विराम लेकर नई रणनीति तैयार करना नेतृत्व के लिए जरूरी हो सकता था। हालांकि, केवल भीड़ के आधार पर पूरे आंदोलन की स्थिति का आकलन करना सही नहीं होगा।
ब्रेक के बाद फिर लौटेंगे दीपके?
अभिजीत दीपके के फैसले की असली वजह अभी स्पष्ट नहीं है। यह आंदोलन को नए सिरे से खड़ा करने की तैयारी हो सकती है, सहयोगियों के मामले में रणनीतिक कदम हो सकता है या फिर मौजूदा परिस्थितियों का आकलन करने का मौका। फिलहाल दीपके ने आंदोलन को स्थगित करने की बात कही है, लेकिन आगे की योजना को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि त्योहार के बाद कॉकरोच जनता पार्टी दोबारा सड़कों पर उतरती है या ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अपनी लड़ाई का तरीका बदलती है।
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