महाराष्ट्र में BJP को दो सीटों पर हार, नागपुर से पुणे तक बिगड़ा चुनावी गणित
उपशीर्षक: नागपुर में कांग्रेस ने RSS के प्रभाव वाले क्षेत्र में दर्ज की जीत, पुणे में शरद पवार गुट ने भाजपा को पछाड़ा; टिकट विवाद और गठबंधन में खींचतान भी बनी चर्चा
नई दिल्ली। महाराष्ट्र विधान परिषद के स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव परिणाम भाजपा के लिए चुनौती बनकर सामने आए हैं। नागपुर और पुणे की दो अहम सीटों पर पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है। नागपुर में कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने भाजपा उम्मीदवार सुधाकर कोहले को हराया, जबकि पुणे में शरद पवार गुट की हर्षदा देशमुख ने जीत दर्ज की। इन नतीजों ने भाजपा के चुनावी प्रबंधन और संगठन की तैयारियों पर बहस छेड़ दी है। नागपुर का परिणाम राजनीतिक रूप से खास माना जा रहा है, क्योंकि यह क्षेत्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का मुख्यालय होने के साथ भाजपा का मजबूत प्रभाव वाला इलाका भी माना जाता है। ऐसे क्षेत्र में कांग्रेस की जीत ने राजनीतिक हलकों का ध्यान खींचा है।
नागपुर में कांटे की टक्कर के बाद कांग्रेस की जीत
नागपुर स्नातक सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार अभिजीत वंजारी ने भाजपा के सुधाकर कोहले को 3,271 मतों के अंतर से पराजित किया। वंजारी को 67,231 वोट मिले, जबकि भाजपा प्रत्याशी को 63,960 मत प्राप्त हुए। शुरुआती मतगणना में भाजपा उम्मीदवार बढ़त बनाए हुए थे, लेकिन वरीयता आधारित मतों की गिनती के बाद तस्वीर बदल गई। पुणे में भी भाजपा को झटका लगा, जहां हर्षदा देशमुख ने पार्टी की उम्मीदवार स्मिता जाधव को हराया। तीन सीटों के चुनाव में भाजपा को सिर्फ पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में सफलता मिली।
पुराने चेहरे को टिकट नहीं मिलने से बढ़ी मुश्किल
नागपुर में भाजपा की हार के पीछे टिकट वितरण को लेकर पैदा हुआ विवाद भी अहम माना जा रहा है। पार्टी ने पूर्व विधान परिषद सदस्य सोले की जगह सुधाकर कोहले को चुनाव लड़ाने का फैसला किया था। इससे नाराज सोले ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल कर दिया। हालांकि, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात के बाद उन्होंने भाजपा प्रत्याशी के समर्थन की बात कही, लेकिन नामांकन वापसी की अवधि खत्म हो चुकी थी। ऐसे में उनका नाम मतपत्र पर बना रहा। निर्दलीय प्रत्याशी नितेश कराले को भी 24,249 वोट मिले। भाजपा उम्मीदवार ने दावा किया कि निर्दलीय प्रत्याशी के मैदान में रहने से पार्टी के मतों का विभाजन हुआ और इसका असर नतीजे पर पड़ा।
मतदाताओं से संपर्क में कमी भी बनी वजह
चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा संगठन के भीतर प्रचार अभियान की प्रभावशीलता पर भी चर्चा हो रही है। पार्टी से जुड़े कुछ नेताओं का मानना है कि इस बार स्नातक मतदाताओं तक पहुंच बनाने के लिए वैसा अभियान नहीं चलाया गया, जैसा पिछले चुनावों में देखने को मिलता था। स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में पंजीकृत मतदाताओं से व्यक्तिगत संपर्क और मतदान प्रक्रिया की जानकारी देना महत्वपूर्ण माना जाता है। वहीं, कांग्रेस उम्मीदवार अभिजीत वंजारी ने शिक्षकों, प्रोफेसरों, कर्मचारियों और पेशेवर संगठनों के साथ लगातार संवाद को अपनी जीत का आधार बताया।
पहली गिनती में भाजपा आगे, फिर भी नहीं बचा पाई सीट
नागपुर चुनाव का परिणाम इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि पहली वरीयता के मतों में भाजपा उम्मीदवार आगे थे। सुधाकर कोहले को 60,924 वोट मिले, जबकि अभिजीत वंजारी को 56,630 मत प्राप्त हुए। लेकिन जीत के लिए निर्धारित 75,438 मतों का आंकड़ा कोई भी प्रत्याशी पार नहीं कर पाया। इसके बाद अगली वरीयताओं के मतों की गणना हुई, जिसमें कांग्रेस उम्मीदवार ने बढ़त हासिल कर ली। अंतिम परिणाम में वंजारी विजयी घोषित हुए। इस दौरान 15,032 मतपत्र अमान्य पाए गए। भाजपा प्रत्याशी ने अमान्य मतों की संख्या को लेकर सवाल उठाए और मतपत्रों में वरीयता क्रम की गलतियों का मुद्दा उठाया।
युवाओं के मुद्दों ने भी खींचा ध्यान
महाराष्ट्र में प्रतियोगी परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रिया को लेकर युवाओं के बीच पहले से ही कई मुद्दे चर्चा में रहे हैं। NEET और महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (MPSC) की परीक्षाओं से जुड़े विवादों के बीच रोजगार, भर्ती में पारदर्शिता और परीक्षा व्यवस्था में सुधार जैसे विषय भी महत्वपूर्ण बने हुए हैं। राजनीतिक विश्लेषण में इन मुद्दों को स्नातक मतदाताओं के रुख से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, चुनाव परिणामों में इनकी वास्तविक भूमिका को लेकर अलग-अलग आकलन सामने आ सकते हैं।
सहयोगी दलों के बीच भी सामने आई नाराजगी
भाजपा की हार के बाद महायुति गठबंधन के भीतर चुनावी सहयोग को लेकर भी बयानबाजी शुरू हो गई है। भाजपा प्रवक्ता नवनाथ बन ने आरोप लगाया कि गठबंधन के कुछ सहयोगी दलों ने नागपुर और पुणे में भाजपा प्रत्याशियों को पर्याप्त समर्थन नहीं दिया। उन्होंने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना को लेकर भी सवाल उठाए। दूसरी ओर, शिवसेना नेताओं ने भाजपा के आरोपों पर पलटवार करते हुए गठबंधन में सभी सहयोगियों को उचित महत्व देने की बात कही। साथ ही चुनाव के दौरान समन्वय समिति की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए गए।
नागपुर और पुणे के नतीजों के बाद भाजपा के सामने अब उम्मीदवार चयन, चुनावी प्रचार और सहयोगी दलों के साथ तालमेल की समीक्षा का सवाल है। इन परिणामों ने महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर आपसी समन्वय को लेकर नई बहस शुरू कर दी है।
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