उत्तराखंड में MBBS दाखिलों पर फिर उठे सवाल, 770 अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों की जांच की मांग
देहरादून। उत्तराखंड में MBBS प्रवेश के लिए राज्य कोटे के तहत जमा किए गए प्रमाणपत्रों की वैधता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। नेशनल पब्लिक सर्विस ट्रस्ट ने करीब 770 अभ्यर्थियों के मूल निवास प्रमाणपत्रों और अन्य दस्तावेजों की जांच कराने की मांग की है। ट्रस्ट के अध्यक्ष कृष्णकांत ने इस संबंध में गृह सचिव शैलेश बगोली को पत्र सौंपकर जल्द जांच कमेटी गठित करने की अपील की है।
770 अभ्यर्थियों की सूची का दावा
ट्रस्ट के मुताबिक, उसके पास ऐसे करीब 770 अभ्यर्थियों का विवरण है, जिनके उत्तराखंड का मूल निवासी होने को लेकर संदेह जताया गया है। आरोप है कि इन अभ्यर्थियों ने राज्य कोटे की MBBS सीटों पर प्रवेश के लिए मूल निवास समेत अन्य प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल किया। ट्रस्ट ने सभी संबंधित दस्तावेजों की जांच कर पात्रता की स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है।
24 में से 18 प्रमाणपत्रों को बताया फर्जी
कृष्णकांत का कहना है कि स्वतंत्रता सेनानी आश्रित श्रेणी के तहत दाखिले में इस्तेमाल किए गए 24 प्रमाणपत्रों की पड़ताल के दौरान 18 प्रमाणपत्र फर्जी पाए जाने का दावा सामने आया था। उन्होंने बताया कि संबंधित प्रमाणपत्रों की जानकारी सरकारी पोर्टल पर उपलब्ध नहीं होने की बात भी कही गई। इसके बाद अन्य अभ्यर्थियों के दस्तावेजों की जानकारी जुटाई गई और संदिग्ध माने जा रहे 770 अभ्यर्थियों की सूची तैयार की गई। हालांकि, इस सूची में शामिल सभी अभ्यर्थियों के दस्तावेजों को फर्जी नहीं माना जा सकता। इसकी वास्तविक स्थिति आधिकारिक जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
शैक्षणिक रिकॉर्ड और मूल निवास का होगा मिलान
ट्रस्ट ने मांग की है कि अभ्यर्थियों की स्कूली शिक्षा से जुड़े रिकॉर्ड, मूल निवास प्रमाणपत्र और दाखिले के समय जमा किए गए दस्तावेजों का मिलान किया जाए। सूची में ऐसे अभ्यर्थियों के शामिल होने का दावा भी किया गया है, जिन्होंने उत्तराखंड के बाहर पढ़ाई की है। ट्रस्ट का कहना है कि जांच में यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि प्रमाणपत्र जारी करने और उनके सत्यापन के दौरान तय नियमों का पालन हुआ था या नहीं। दूसरे राज्यों में पढ़ाई करना अपने आप में किसी प्रमाणपत्र को फर्जी साबित नहीं करता, इसलिए प्रत्येक मामले की अलग-अलग जांच जरूरी है।
हाईकोर्ट के निर्देश के बाद कार्रवाई की मांग
ट्रस्ट अध्यक्ष के अनुसार, इस मामले से जुड़ी जनहित याचिका पर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 15 अक्टूबर को राज्य सरकार को निर्देश दिए थे। उनके मुताबिक, आदेश प्राप्त होने के चार सप्ताह के भीतर गृह सचिव और संबंधित सचिव को जांच कमेटी गठित करनी है। ट्रस्ट ने मांग की है कि कमेटी निर्धारित समयसीमा में जांच पूरी कर रिपोर्ट सरकार को सौंपे। साथ ही, यदि किसी स्तर पर अनियमितता सामने आती है तो संबंधित लोगों की जिम्मेदारी तय कर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
प्रमाणपत्र जारी करने वाले अधिकारियों की भूमिका भी जांचने की मांग
मामले में ट्रस्ट ने सिर्फ अभ्यर्थियों के दस्तावेजों की जांच तक कार्रवाई सीमित नहीं रखने की अपील की है। उसकी मांग है कि विश्वविद्यालय के अधिकारियों, रजिस्ट्रार, प्रवेश प्रक्रिया से जुड़े कर्मचारियों और प्रमाणपत्र जारी करने तथा सत्यापन करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका भी जांची जाए। जांच के दौरान यह पता लगाने पर जोर दिया गया है कि कहीं दस्तावेजों को मंजूरी देने या प्रमाणपत्र जारी करने में नियमों की अनदेखी तो नहीं हुई।
भविष्य में गड़बड़ी रोकने के लिए स्थायी व्यवस्था पर जोर
ट्रस्ट ने ऐसे मामलों की नियमित निगरानी के लिए स्थायी जांच कमेटी बनाने की मांग भी उठाई है। इसका उद्देश्य आरक्षण या विशेष श्रेणी के तहत लाभ लेने वाले अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों का समय-समय पर सत्यापन करना है।
फिलहाल, ट्रस्ट ने शासन से जल्द कमेटी गठित कर जांच शुरू कराने की मांग की है। अब इस मामले में सरकार की अगली कार्रवाई और संदिग्ध दस्तावेजों की जांच को लेकर होने वाले फैसलों पर नजर रहेगी।
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