वसुंधरा ताल पर अब रहेगी हाईटेक निगरानी, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर स्थापित हुई पूर्व चेतावनी

Oct 14, 2026 - 10:01
Oct 31, 2026 - 12:08
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वसुंधरा ताल पर अब रहेगी हाईटेक निगरानी, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर स्थापित हुई पूर्व चेतावनी
वसुंधरा ताल पर अब रहेगी हाईटेक निगरानी, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर स्थापित हुई पूर्व चेतावनी

ग्लेशियल झील से जुड़े संभावित खतरों पर मिलेगी नजर, मौसम से लेकर जलस्तर तक के आंकड़े होंगे दर्ज

देहरादून। उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों से पैदा होने वाले संभावित खतरों की निगरानी को मजबूत करने के लिए राज्य सरकार ने महत्वपूर्ण पहल की है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर चमोली जिले के वसुंधरा ताल में पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने का पहला चरण पूरा कर लिया गया है। अत्याधुनिक सेंसरों से लैस यह व्यवस्था झील के जलस्तर, स्थानीय मौसम, बर्फ की स्थिति और आसपास होने वाली भू-गतिविधियों से जुड़े आंकड़े जुटाएगी। इससे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) यानी ग्लेशियल झील फटने से आने वाली संभावित बाढ़ के जोखिमों का आकलन करने में मदद मिलेगी। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और प्रतिकूल मौसम के बीच वैज्ञानिक एवं तकनीकी दल ने वसुंधरा ताल और उसके आसपास विभिन्न उपकरण स्थापित किए। अभियान पूरा कर लौटे दल का उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (यूएसडीएमए) में सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने स्वागत किया। इससे पहले 29 सितंबर को मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने अभियान दल को रवाना किया था।

मुख्यमंत्री धामी ने आपदा पूर्व तैयारी को दी प्राथमिकता

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने वसुंधरा ताल में पूर्व चेतावनी प्रणाली की स्थापना के पहले चरण की सफलता पर प्रसन्नता जताई। उन्होंने कहा कि पर्वतीय राज्य होने के कारण उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों से जुड़े संभावित खतरों की समय रहते पहचान करना जरूरी है। इसके लिए आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक अनुसंधान और विभिन्न संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय के जरिए आपदा प्रबंधन व्यवस्था को मजबूत किया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने इस पहल को उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जोखिमों की निगरानी और समय पर चेतावनी देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। इससे संवेदनशील क्षेत्रों में आपदा से निपटने की तैयारियों को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।

अत्याधुनिक सेंसर बताएंगे झील और मौसम की स्थिति

वसुंधरा ताल में स्थापित प्रणाली में मौसम संबंधी जानकारी जुटाने के लिए ऑल-इन-वन मौसम सेंसर लगाया गया है। यह हवा की गति एवं दिशा, वर्षा, सौर विकिरण, वायु तापमान और वायुदाब के आंकड़े दर्ज करेगा। झील के जलस्तर में होने वाले बदलावों को मापने के लिए फ्लोटिंग और सबमर्ज्ड वाटर लेवल सेंसर लगाए गए हैं। संभावित बाढ़ से जुड़ी कंपन और झुकाव जैसी गतिविधियों की निगरानी के लिए दो एक्सेलेरोमीटर एवं टिल्ट सेंसर स्थापित किए गए हैं। हिमस्खलन संबंधी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए एक अतिरिक्त एक्सेलेरोमीटर एवं टिल्ट सेंसर भी लगाया गया है। बर्फ की गहराई मापने के लिए स्नो डेप्थ सेंसर और बर्फ की सतह के नीचे अलग-अलग गहराइयों पर तापमान दर्ज करने के लिए सात तापमान सेंसर लगाए गए हैं। झील की सतह के तापमान की निगरानी के लिए एक अलग सेंसर भी स्थापित किया गया है। इन उपकरणों से मिलने वाले आंकड़े झील के आसपास बदलती परिस्थितियों और संभावित जोखिमों को समझने में सहायक होंगे।

सामान्य स्थिति में हर दो घंटे में भेजे जाएंगे आंकड़े

पूर्व चेतावनी प्रणाली के सेंसर सामान्य परिस्थितियों में प्रत्येक दो घंटे में आंकड़े सीबीआरआई, रुड़की और यूएसडीएमए के डैशबोर्ड पर भेजेंगे। दोनों स्थानों पर प्राप्त आंकड़ों की नियमित निगरानी की जाएगी। किसी आपात स्थिति में सेंसर दो घंटे के निर्धारित अंतराल का इंतजार किए बिना तत्काल आंकड़े भेज सकेंगे। इससे असामान्य परिस्थितियों का जल्द पता लगाने में मदद मिल सकती है। वसुंधरा ताल में मोबाइल नेटवर्क की उपलब्धता नहीं होने के कारण डेटा भेजने के लिए इरिडियम उपग्रह संचार तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। अभियान दल ने वापसी से पहले संचार व्यवस्था का परीक्षण कर आंकड़ों के आदान-प्रदान की पुष्टि की।

सौर ऊर्जा और बैटरी से मिलेगी बिजली

दुर्गम क्षेत्र में बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए प्रणाली को सौर पैनल और बैटरी से संचालित करने की व्यवस्था की गई है। इसमें 280 एम्पीयर क्षमता की बैटरी लगाई गई है, जो पर्याप्त धूप नहीं मिलने पर लगभग 10 दिनों तक बैकअप दे सकती है। इससे खराब मौसम के दौरान भी उपकरणों का संचालन बनाए रखने में सहायता मिलेगी। उपकरणों की स्थापना के लिए स्टील के मॉड्यूलर डिजाइन पर आधारित फाउंडेशन तैयार किया गया है। इसमें स्थानीय पत्थरों और उपलब्ध सामग्री का उपयोग किया गया है तथा सीमेंट का इस्तेमाल नहीं किया गया। क्षेत्र में हवा की गति लगभग 15 से 50 किलोमीटर प्रति घंटा आंकी गई है, जबकि फाउंडेशन को 100 किलोमीटर प्रति घंटा तक की हवा को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है।

सीबीआरआई और वाडिया संस्थान के वैज्ञानिकों ने निभाई अहम भूमिका

सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने बताया कि यूएसडीएमए ने राष्ट्रीय ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के अंतर्गत यह अभियान संचालित किया। केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई), रुड़की और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून के वैज्ञानिकों एवं तकनीकी विशेषज्ञों ने उपकरणों की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने बताया कि ऊंचाई वाले दुर्गम क्षेत्र में उपकरणों को स्थापित करना चुनौतीपूर्ण था। वैज्ञानिक दल ने तकनीकी दक्षता और आपसी समन्वय के माध्यम से अभियान पूरा किया। यूएसडीएमए ने आवश्यक लॉजिस्टिक सहायता, संचार उपकरण और समन्वय उपलब्ध कराया। राज्य आपदा प्रतिवादन बल (एसडीआरएफ), राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ) और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) ने भी अभियान में सहयोग किया। आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास मंत्री मदन कौशिक ने इसे ग्लेशियल झीलों की निगरानी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने भी इस पहल को राज्य की आपदा पूर्व तैयारियों को वैज्ञानिक एवं तकनीकी आधार पर मजबूत करने वाला कदम बताया।

600 मीटर चौड़ा और 900 मीटर लंबा है वसुंधरा ताल

सीबीआरआई, रुड़की के वैज्ञानिक एवं अभियान दल के प्रमुख डॉ. डीपी कानूनगो के अनुसार, वसुंधरा ताल की गहराई लगभग 38.50 मीटर, चौड़ाई 600 मीटर और लंबाई 900 मीटर है। अभियान के दौरान स्थापित सेंसरों और संचार प्रणाली के माध्यम से आंकड़ों के आदान-प्रदान का सत्यापन किया गया। उन्होंने बताया कि उपलब्ध पुराने आंकड़ों और वर्तमान स्थिति की तुलना में झील के आकार में कोई विशेष बदलाव नहीं देखा गया है। उपकरणों की स्थापना के लिए ऐसे स्थान का चयन किया गया, जहां भूस्खलन और हिमस्खलन जैसी गतिविधियों का जोखिम अपेक्षाकृत कम है। स्थापना के दौरान मौसम, भौगोलिक परिस्थितियों और उपकरणों की सुरक्षा का ध्यान रखा गया। इस अवसर पर सीबीआरआई के निदेशक प्रो. आर. प्रदीप कुमार, अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी (क्रियान्वयन) एवं डीआईजी राजकुमार नेगी, यूएलएमएमसी के निदेशक डॉ. शांतनु सरकार, डॉ. एसके पाणीग्रही, डॉ. कौशिक पंडित, चंद्रभान पटेल, कांतिलाल सोलंकी, डॉ. राजेश कुमार दास, अजीत सिंह गहरवार और आदित्य भगत सहित अन्य अधिकारी एवं विशेषज्ञ उपस्थित रहे। 

वसुंधरा ताल में पूर्व चेतावनी प्रणाली की स्थापना से उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों की निगरानी के प्रयासों को तकनीकी मजबूती मिलेगी। सेंसरों से प्राप्त आंकड़ों के जरिए संभावित खतरों का आकलन करने, आपदा पूर्व तैयारियों को बेहतर बनाने और संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा उपायों की योजना तैयार करने में मदद मिलेगी।

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